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लक्ष्मी ने मोबाइल के जरिये पिता को कैसे दिलाई पीएम आवास की राशि, जानने के लिए पढ़े पूरी कहानी

laxmi

सत्रह वर्षीय लक्ष्मी महज आठवीं पास है। वह आगे और पढऩा चाहती थी, लेकिन परिवार की माली हालत ने इसकी इजाजत नहीं दी। मोबाइल फोन के जरिये अपने हक-हुकूक को समझा। पीएम आवास की जानकारी जुटाई और अपने पिता को यह अनुदान दिलाने में सफल रही। लक्ष्मी के परिवार में माता-पिता के अलावा दो भाई भी हैं। ये पांच सदस्यीय परिवार मजदूरी पर निर्भर है। पन्ना जिले के धनौजा गांव की गौंड आदिवासी ये किशोरी माता-पिता के साथ हीरा की खदानों में मजदूरी करती है, लेकिन यहाँ महीने में औसतन 10-15 दिन ही काम मिलता है। मजदूरी महज 120 रुपए। इसी के साथ धनौजा में सरकारी योजनाओं की जानकारी हासिल करना भी बड़ी चुनौती है। गाँव में सुविधाओं का अभाव इसमें बाधक है। लक्ष्मी ने इस बाधा से निपटने के लिए खुद रास्ता इजाद किया। ई-दस्तक केंद्र ने लक्ष्मी की बहुत मदद की।

दरअसल, पन्ना जिले के धनौजा में पीएम आवास योजना के तहत कुछ लोगों के मकान बन रहे थे। लक्ष्मी के परिवार की माली हालत खराब होने के बावजूद इसका लाभ नहीं मिला तो लक्ष्मी ने इसके पुरजोर प्रयास शुरू किए। शुरुआत में वह सरकारी ऑफिसों में भटकती रही। पंचायत कार्यालय गई, लेकिन उसे पीएम आवास की मंजूरी वाली सूची नहीं मिल सकी। यहां उसे एक युवक ने कंप्यूटर सेंटर जाने की सलाह दी। इसके बाद लक्ष्मी बृजपुर के एक कंप्यूटर सेंटर से जानकारी लेती रही। इसके एवज में उसे 20 से 50 रुपए तक चुकाने पड़ते थे। जब लक्ष्मी को यह पता चला कि दुकानदार मोबाइल फोन से इंटरनेट का इस्तेमाल कर कंप्यूटर से ये तमाम जानकारी देता है तो उसने मोबाइल खरीदने का मन बनाया। इसके लिए खर्चों में कटौती की। लक्ष्मी को गुटखा खाने की बुरी लत थी। उसने मोबाइल खरीदने के लिए गुटखा छोड़ा और 5000 रुपए की बचत की, लेकिन मोबाइल की कीमत 6000 हजार रुपए थी।

लक्ष्मी ने कुछ रुपए अपनी मां से लिए और मोबाइल खरीद लिया। लक्ष्मी के सामने अब बड़ा सवाल मोबाइल फोन ऑपरेट करने का था। इसके लिए उसने ई-दस्तक केंद्र पर संपर्क किया और मोबाइल फोन ऑपरेट करना सीख गई। इंटरनेट सर्फिंग की तरकीब भी सीखी। इसके बाद लक्ष्मी ने अपने काम तो किए ही ई-प्लेटफॉर्म से जुड़े काम दूसरे लोगों के लिए भी किए। लक्ष्मी ने पिता के नाम पीएम आवास का फॉर्म भरा और उसका अपडेट लेती रही। अंतत: वह अपने पिता को इस योजना का लाभ दिलवाने में सफल हुई। लक्ष्मी अब ई-वालेंटियर है। वह समुदाय के अन्य लोगों की भी मदद कर रही है। अब लक्ष्मी के काम में कोई टालमटोली नहीं करता, कयोंकि वह डिजिटल प्लेटफॉर्म अपनी मुट्टी में लेकर चलती है।