डिजिटल डेमोक्रेसी

भुलिया से छिना जीने का सहारा तो काम आया डिजिटल प्लेटफार्म, पढ़ें पूरी खबर...

bhuliaपन्ना से 35 किलोमीटर दूर रखेल टोला निवासी भुलिया बाई गोंड को उस समय पेट भरने के लाले पड़ गए, जब वृद्धावस्था पेंशन बंद हो गई। हालांकि, हर माह मिलने वाले इन 300 रुपयों से भुलिया का गुजारा चल नहीं पाता था। वह आधा समय देवेंद्र नगर में रहने वाली अपनी बेटी के घर गुजारती थी। रखेल टोला से देवेंद्र नगर की दूरी करीब 50 किलोमीटर है। भुलिया की दो विधवा बहुएं और उनके बच्चे हैं, लेकिन इनकी माली हालत खराब होने...

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यूजड डिस्पोजल से लैंप बनाकर पूरी की लीक से हटकर काम करने की हसरत

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खंडवा जिले के डाभिया गांव के कुवरसिंह काजले की बेटी गायत्री के मन में हमेशा से कुछ नया करने की चाह थी। परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण वह चाहकर भी कुछ कर नहीं पा रही थी। गांव में संसाधनों का अभाव है। 17 वर्षीय गायत्री बारहवीं की पढ़ाई करने अपने गांव से करीब पांच किलोमीटर दूर पटाजन जाती है। उसके माता-पिता मजूदरी का परिवार चला रहे हैं। गायत्री की एक बहन और भाई भी है, जो स्कूल जाते...

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ऑनलाइन शिकायत से डरे सरपंच-सचिव, गंगा को दिलाई पेंशन

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खंडवा जिले के डाभिया में करीब 500 परिवार निवास करते हैं। इन्हीं में एक परिवार गंगाबाई का भी है। यू तो वह आंगनबाड़ी सहायिका थी, लेकिन 2015-16 में कार्यकाल पूरा होने के बाद यह काम छूट गया। चूंकि कोई पेंशन की व्यवस्था भी नही है, इसलिए गंगा के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया। उनका एक बेटा है, जिसके दो बच्चे हैं। बेटा खेती करता है, लेकिन पैदावार बहुत कम होने के कारण परिवार चलाना मुश्किल है। जो...

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यू-ट्यूब से जैविक खेती की पाठशाला लगा रहा सुखराम

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झाबुआ जिले के कचरोटिया गांव का सुखराम भाभर जैविक खेती की अनूठी पाठशाला लगाने के कारण काफी चर्चा में है। इस पाठशाला के लिए वह न तो किसी ट्रेनिंग सेंटर में गया और न ही कोई औपचारिक पढ़ाई की। सुखराम ने डिजिटल तकनीक का महत्व समझा, इस तकनीक को सीखा और इसके बेहतर प्रयोग से अब वह गांव में सममान का हकदार युवा बन गया है। उनसे जुड़े करीब एक दर्जन किसान भी अब जैविक खेती कर कम खर्च में अच्छा मुनाफा कमा रहे...

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ई-वालेंटियर ने ऐसा क्या किया कि मांगुडी को मिला जीने का सहारा

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68 वर्षीय मांगुड़ी बाई के जीवन में दस वर्ष पहले परेशानियां शुरू हो चुकी थी, जब उनके पति शोभा भाभर की मृत्यु हुई। उम्र के इस पड़ाव में आकर मजदूरी मिलना और कर पाना दोनों बहुत मुश्किल हैं। हालांकि, उनका गरीबी रेखा का कार्ड है, जिस पर राशन मिलता है। लेकिन, इसके लिए भी रुपए तो चाहिए। हम बात कर रहे हैं झाबुआ जिले की पेटलावद तहसील के देवली गांव की उस महिला की, जिसके दो बेटे और दो बहुएं भी...

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