डिजिटल डेमोक्रेसी

सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत की तब सुधरे हैंडपंप

ऑनलाइन शिकायत के बाद मंजूर हुई नल-जल योजना

पन्ना और खंडवा जिले के ये तीन मामले यह साबित करने के लिए काफी हैं कि सरकारी महकमों के काम का ढर्रा सुधरा नहीं है। अपवाद स्वरूप कुछ मामलों को छोड़ दें तो उसे आजमन की समस्या से सीधा सरोकार नहीं है। फिर मामला पेयजल का ही क्यों न हो। हैंडपंप बंद हो जाए तो मैकेनिक सफेद हाथी साबित होते हैं। उन्हें ढूंढना और फिर हैंडपंप सुधरवाना ग्रामीणों के लिए बेहद...

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डिजिटल डेमोक्रेसी परियोजना की टीम ने दिलाया वंचितों को हक

सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस की दुकानों पर राशन फर्जीवाड़ा रोकने के मकसद से सरकार ने हितग्राहियों का फिंगर प्रिंट का मिलान अनिवार्य कर दिया है। यह अच्छी पहल है, क्योंकि इससे गरीबों के हिस्से के राशन में धांधली के मामले कम हुए हैं। पात्र व्यक्तियों को ही अनाज का वितरण किया जा रहा है, लेकिन यह व्यवस्था उन गरीबों के लिए दुखदायी साबित हुई, जिनकी उंगलियां मेहनत-मजदूरी करते-करते घिस गई हैं।...

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यू-ट्यूब लाया संध्या के जीवन में आया नया सवेरा

यह किस्सा ई-वालेंटियर संध्या रजक का है। 25 वर्षीय संध्या का परिवार भोपाल की ईष्वर नगर बस्ती में रहता है। उनके दो बच्चे काव्या पहली कक्षा और कृष्णा केजी1 में पढ़ते हैं। संध्या ने स्मार्टफोन के जरिए आजीविका का साधन जुटा लिया। उन्होंने यू-ट्यूब पर सिलाई से जुड़े वीडियोज देखे, जिससे आजीविका की नई राह खुल गई। हालांकि, उनके पूरे परिवार में एक स्मार्टफोन है, वह भी संध्या के पति देवेंद्र के पास। देवेंद्र...

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भुलिया से छिना जीने का सहारा तो काम आया डिजिटल प्लेटफार्म

उम्र 71 वर्ष से अधिक। नाम भुलिया बाई गोंड। पता रखेल टोला, जिला पन्ना। रखेल टोला पन्ना से करीब 35 किलोमीटर दूर है। उम्र से जाहिर है कि भुलिया से मेहनत मजदूरी नहीं बनती, वह पेंशन पर निर्भर है। हालांकि, यह भी महज 300 रुपए थी, जिससे गुजर-बसर नहीं हो पाता था तो रखेल टोला से करीब 50 किलोमीटर दूर रहने वाली बेटी मदद करती थी। सितंबर 2017 में भुलिया की पेंशन बंद हुई तो मानो जीने का सहारा छिन गया। अब उनके...

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पूनम ने यू-ट्यूब देखकर शुरू किया स्टार्टअप

आदिवासी बहुल झाबुआ जिले के छोटे से गांव कुंडली की लड़की यदि यू-ट्यूब देखकर अपना रोजगार शुरू कर दे तो संभवतः सभी को आष्चर्य होगा। इसकी एक वजह यह भी है कि इस गांव में ज्यादातर परिवार मजदूरी करते हैं। छोटी जोत की खेती होती है। यानी इसमें इतनी पैदावार नहीं हो पाती कि सालभर परिवार का गुजारा किया जा सके। जाहिर है, ग्रामीणों को मजदूरी के लिए पलायन करना पड़ता है। इन विपरीत परिस्थितियों के बीच चाहकर भी कुछ...

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