डिजिटल डेमोक्रेसी

डिजिटल प्रजातंत्र

मध्य प्रदेश में डिजिटल प्रौद्योगिकी की सभी तक पहुँच बनाने के लिये समुदाय-आधारित एवं अनुसंधान-केन्द्रित एक पहल

पृष्ठभूमि

संविधान के मूल तत्वों पर एक नज़र 

हम यह जानते हैं और हमें इसकी स्प्ष्ट समझ भी होना चाहिए कि हमारा संविधान हमें व्यक्तिगत गरिमा के मद्दे नज़र राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने में निम्नलिखित अनुसार प्रतिष्ठा और अवसर की समता देने का वादा करता है:

  • सामजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता।
  • कानून के सामने सभी की बराबरी- धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर कोई भेदभाव मंज़ूर नहीं।
  • छुआछूत का अंत भी समता के मूल अधिकारों में शामिल है।
  • इसी प्रकार बोलने की आज़ादी, अपनी बात रखने की स्वतंत्रता और शांतिपूर्वक सम्मलेन, संगम या संघ बनाने, भारत में सभी जगह बिना किसी रोक टोक के विचरण की आजादी, भारत के किसी भी भाग में निवास करने और बस जाने, कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने, अपराधों के लिए दोष सिद्धि के सम्बन्ध में संरक्षण, प्राण और व्यकिगत स्वतंत्रता का संरक्षण, शिक्षा (छः वर्ष से चौदह वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा) जैसे अधिकार स्वतंत्रता के अधिकारों में आते हैं।
  • इसी तरह मानव-तस्करी, बंधुआ श्रम और कारखानों आदि में बच्चों का नियोजन निषेध है।

हमारा संविधान मूल अधिकारों के ज़रिये हमें अपने अंतःकरण की और धर्म को बिना किसी बाधा के मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता के साथ धार्मिक कार्यों के प्रबंधन की स्वतंत्रता आदि के रूप में धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार भी देता है। इसी के साथ देश के निवासी नागरिकों के किसी भी भाग में, जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे बनाये रखने का अधिकार देता है। इसमें अल्प-संख्यकों को शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने के अधिकार भी दिए गए हैं।

प्रजातंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

जहाँ तक प्रजातंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रताका प्रश्न है, हमारी संवैधानिक व्यवस्था में प्रजातंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को एक-दूसरे का पूरक और पोषक माना गया है। सकारात्मक सामाजिक दृष्टिकोण और व्यक्ति की गरिमा का सतत् सशक्तिकरण हमारे लिए बहुत अहम् हैं। इसके जनतंत्रीकरण के लिये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अनिवार्य है। साथ ही प्रजातंत्र को जीवंत बनाये रखने के लिए भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्त्वपूर्ण है। इससे लोगों में आपस में संवाद करने एवं जानकारियों के आदान-प्रदान में मदद मिलती है। परिणाम-स्वरूप, बेहतर और तथ्यपरक व्यक्तिगत एवं सामूहिक जानकारी से लैस नागरिकों को जनतंत्र में भागीदारी का अवसर मिलता है।

डिजिटल प्रजातंत्रपरियोजना की अवधारणा (Perspective of Digital Democracy Project)

यह परियोजना दो स्वतंत्र अवधारणाओं - डिजिटल तकनीक और लोकतंत्र के मेल से रची गयी है। इन दोनों अवधारणाओं की समझ से हम डिजिटल प्रजातंत्र की स्पष्ट व्याख्या कर सकते हैं। 

डिजिटल तकनीक की विशेषताएं और पारंपरिक मीडिया की सीमितता (Characteristics of Digital Technique and Limitations of the Traditional Media)

हम जानते हैं कि पिछले तीन दशकों में डिजिटल तकनीक ने अपने दायरे और पंहुच में बहुत तेज़ और बहुत ज्यादा विस्तार किया है। इसका सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह पारंपरिक मीडिया या संचार माध्यमों की तरह यह तकनीक कुछ ख़ास लोगों या समूहों के नियंत्रण में नहीं है। यह माध्यम हर उस एक व्यक्ति को अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मंच प्रदान करता है, जो इस तकनीक का इस्तेमाल करता है। कंप्यूटर, लैपटाप, स्मार्टफोन, इंटरनेट आदि इकाईयों के मेल से संचार का डिजिटल मंच बनता है। डिजिटल तंत्र की यह विशेषता है यह एकतरफ़ा संवाद के सिद्धांत पर नहीं टिका है। इसमें बहुपक्षीय और बहु-आयामी संचार की अपार संभावनाएं हैं। हर व्यक्ति अपने अनुसार समाचार की परिभाषा गढ़ सकता है, अपने अनुसार सूचना के महत्त्व का आंकलन कर सकता है और उसको दुनिया से साझा कर सकता है।

दूसरी ओर,पारंपरिक मीडिया में यह स्वतंत्रता प्रत्येक व्यक्ति को उपलब्ध नहीं हो पाती है। प्रायः जिसे हम मुख्यधारा का मॉस मीडिया कहते रहे हैं, उसका विस्तार जरूर हुआ है, किन्तु वह विस्तार वास्तविक नहीं कहा जा सकता है। मध्यप्रदेश में पढ़े जाने वाले अखबारों के जिला संस्करण भी बड़ी तादाद में निकलते हैं। इनमें,उस सम्बंधित जिले की ख़बरें और मुद्दे तो प्रकाशित होते हैं और स्थानीय समाज को यह आभास भी होता है कि उनसे संबंधितमुद्दे मीडिया में स्थान पा रहे हैं, परन्तु वास्तव में होता यह है कि ये स्थानीय विषय स्थानीय संस्करण यानी जिले की सीमा के भीतर ही सिमट कर रह जाते हैं। यानी, जो लोग उन मुद्दों या समस्याओं से जूझ रहे होते हैं, ये ख़बरें केवल उन्हीं तक पंहुच रही होती हैं; न कि राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर उनका प्रसार होता है। यही कारण है कि मीडिया में विषय आने के बाद भी स्थितियों में बदलाव नहीं होता है। यह भी देखने में आ रहा है कि मीडिया अब छोटी-छोटी इकाईयों में बिखर सा रहा है।

ऐसे में डिजिटल तकनीक ही व्यक्ति को अपने बारे में, अपने विषयों के बारे में और अपनी विशेषताओं या समस्यायों के बारे में अपनी बात, तथ्य और सूचना पाने या देने का माध्यम या उसके प्रसार में सहायक एवं प्रभावी मंच बन सकता है।

लोकतंत्र में निहित सिद्धांत और डिजिटल तकनीक की संभावनाएं (Underlying Principles of Democracy and the Potential of Digital Technique)

भारत ने लोकतांत्रिक व्यवस्था के स्वरुप और सिद्धांत को स्वीकार किया है। इसमें लोगों के द्वारा, लोगों के लिए और लोगों की व्यवस्था की संकल्पना की गयी है। इसके अन्तर्गत हम एक जन-प्रतिनिधित्व वाली राजनीतिक व्यवस्था को लागू करते हैं, जिसमें चुने हुए लोग नीति, नियम और क़ानून-आधारित व्यवस्था बनाते हैं।

पिछले सात दशकों के अनुभव बताते हैं कि मतदान करने के बाद लोगों की शासन-व्यवस्था में कोई भूमिका रह नहीं जाती है। ऐसे में डिजिटल तकनीक ने लोगों को सतत् रूप में अपनी बात को सीधे अभिव्यक्त करने का बहुत अहम् अवसर उपलब्ध करवाया है। अब आम लोग डिजिटल तकनीक के जरिये अपनी बात कह कर, उस पर समाज के भीतर जनमत का निर्माण कर सकते हैं, बहुत खुल कर सही को सही और गलत को गलत कह पाते हैं। यह मानी हुई बात है कि जब लाखों लोग किसी विषय पर अपनी राय व्यक्त करते हैं, तब हमें उसके वज़न के अहसास के साथ यह भी समझ आता है कि विचारों में कितनी विविधता हो सकती है और यह कि इस विविधता की हमें कितनी अधिक ज़रुरत है।

वैचारिक विविधता को उभारने में डिजिटल तकनीक की महती भूमिका दिखाई देती है। समाज के भीतर के शोषणकारी व्यवहार और समाज की सांस्कृतिक-सामजिक विशेषताओं, दोनों को ही डिजिटल तकनीक से एक उपयोगी मंच मिला है। हम यह मानते हैं कि यदि सरकार को संवैधानिक व्यवस्था को बेहतर बनाना है तो इसके लिए समाज, आम लोगों, महिलाओंऔर विभिन्न सामाजिक तबकों से प्रतिक्रिया या फीडबैक हासिल करने की संस्कृति स्थापित करने की अनिवार्यता को स्वीकार करना ही होगा। इससे राष्ट्र-हित में आवश्यक बदलाव सुगम होंगे एवं उनकी बहु-पक्षीय स्वीकार्यता भी सहज हो सकेगी।

डिजिटल तकनीक के माध्यम से आम लोग, जो व्यवस्था से दूर रहे हैं, सुझाव और प्रतिक्रिया देने में शामिल हो पाते हैं। इससे पता चल पाता है कि कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका की प्राथमिकताएं क्या हैं, वे किस रूप में अपनी स्वयं की एवं पारस्परिक भूमिकाओं को निभा रहे हैं और उसका समाज पर क्या असर पड़ रहा है? जब लैंगिक बाधाएं या सीमाएं टूटती हैं, और जाति या भौगोलिक दूरियां पाटी जाती हैं, तब संचार और संवाद का समाज और व्यवस्था पर बहुत गहरा और सकारात्मक असर पड़ता है।

डिजिटल तकनीक एवं लोक सेवाएं (Digital Technique and Public Services)

यह भी देखा जा रहा है कि अब लोक सेवाओं की निगरानी, सेवा को प्रदान किये जाने और पारदर्शिता के लिए अधिकृत और नीतिगत रूप से डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। सेवाओं को पाने के लिए आवेदन करना, परिणाम जानना, प्रक्रिया पर नज़र रखने और नियोजन के लिए भी डिजिटल तकनीक का सघन इस्तेमाल किया जा रहा है। इतना ही नहीं, यदि किसी विषय में शिकायत की जाना है या जानकारी पाना है, तो यह भी डिजिटल मंच से जुडा हुआ मसला है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या लोगों के पास डिजिटल तकनीक के इस्तेमाल का कौशल और संसाधन उपलब्ध है? क्या उनकी पहुँच सार्वभौमिक है? कहीं ऐसा तो नहीं की सीमित पहुँच के चलते असमानता की खाई के और ज्यादा बढ़ने का खतरा पैदा हो रहा है?

डिजिटल प्रजातंत्र परियोजना क्या है?(What is the Project on ‘Digital Democracy?)

डिजिटल प्रजातंत्रः डिजिटल प्रौद्योगिकी की सार्वभौमिक पहुँच के लिये समुदाय-आधारित एवं रिसर्च-केन्द्रित एक पहल’ (Digital Democracy: A Community-based Research -Oriented Intervention for Universat Access of Digital Technology)

परियोजना के इस मॉडल के माध्यम से यह प्रयास किया जा रहा है कि समुदाय तक डिजिटल प्रौद्योगिकीकी सार्वभौमिक पहुँच एवं उसके व्यक्तिगत तथा लोक सेवाओं के प्रभावी उपयोग को सुनिश्चित करने में आवश्यक आयामों की पहचान की जाये। इसके लिए समुदाय-आधारित प्रक्रियाओं एवं समुदाय-केन्द्रित अनुसंधान पर केन्द्रित रणनीति एवं गतिविधियाँ इस फोर्ड फाउंडेशन-सहायित परियोजना का स्वरुप परिभाषित करती हैं।

परियोजना के उद्देश्य

  1. ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में, विशेष रूप से वांछित समुदायों के लिए, डिजिटल तकनीक और उसके सहयोगी उपकरणों की समान पहुंच सुनिश्चित करना।
  2. समुदाय में लोगों का तकनीकी ज्ञान एवं कौशल बढ़ाना ताकि वे अपनी स्वयं की आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ-साथ जन समुदाय के लिए व्यापक विकास योजनाओं के बेहतर, पारदर्शी तथा जवाबदेह नियोजन, क्रियान्वयन एवं उनकी निगरानी की शासन व्यवस्था में सक्रिय भागीदारी कर सकें।
  3. विविधता तथा विभिन्नताओं को मद्देनज़र रखते हुए ऐसी सघन पैरवी करना जिससे सभी हितधारक समावेशी डिजिटल साक्षरता हासिल कर सकें।

परियोजना की अवधि एवं कार्यक्षेत्र

1 जून 2017 से 31 मई 2019

परियोजना के कार्यक्षेत्र में शामिल हैं: पन्ना (बुंदेलखंड क्षेत्र),झाबुआ (मालवा क्षेत्र),खंडवा (निमार क्षेत्र) और भोपाल (औद्योगिकीकृत शहरी क्षेत्र)।

रणनीतियाँ

  1. परियोजना टीमों का प्रशिक्षण और उनमें क्षमता निर्माण।
  2. समुदाय में से लिए गए ई-स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण और उनमें क्षमता निर्माण।
  3. चुनिंदा समुदाय के सदस्यों की क्षमता निर्माण।
  4. सार्वभौमिक डिजिटल पहुँच एवं मानव विकास के मुद्दों पर प्रशिक्षण तथा संसाधन केंद्र का गठन।
  5. समुदाय स्तर पर ई-लर्निंग संसाधन केंद्र ' डिजिटल सोशल एक्शन लैब की स्थापना'।
  6. क्षेत्रीय टीम के सहयोग से सामुदायिक सूचना, धारणाओं और मांगों को साझा कर सकने के लिए मंच का विकास (क्षेत्रीय टीम के सहयोग से समुदाय द्वारा वेबसाइट विकसित किया जाना)।
  7. सामाजिक विकास योजनाओं की विकेन्द्रीकृत योजना (Decentralised Planning) बनाने की व्यवस्था में समर्थन और सहयोग।
  8. समुदाय-आधारित हस्तक्षेपों से उभरे अनुभवों का उपयोग करते हुए जिला और राज्य स्तर पर शासकीय अधिकारियों साथ संवाद।
  9. निःशक्त व्यक्तियों, महिलाओं और वंचित वर्ग के लोगों की अपेक्षाओं पर ध्यान देते हुए उन्हें कार्यक्रम से जोड़ने के सक्रिय उपाय करना।
  10. प्रक्रिया का दस्तावेजीकरण और अनुसंधान।

प्रमुख गतिविधियाँ

  • जन समुदाय के भीतर ऐसे ई-स्वयंसेवकों(वालंटियर्स) की टीमें तैयार करना जो डिजिटल प्रजातंत्र की अवधारणा को प्रचारित एवं प्रसारित कर सकें।
  • डिजिटल सोशल एक्शन लैब (ई-दस्तक केंद्र) की स्थापना और संचालन।
  • फील्ड टीमों और ई-स्वयंसेवकों की क्षमता निर्माण के लिए राज्य स्तरीय कार्यशाला, जिला एवं राज्य स्तरीय बैठकें।
  • अनुसंधान और दस्तावेज़ीकरण(Research & Documentation)।
  • सामुदायिक निगरानी बैठकें।
  • केंद्रित समूह चर्चाओं (Focus Group Discussions) का संचालन।